महाभारत 12.321.12
तपसा तेजसा चैव दुर्निरीक्षौ सुरैरपियस्य प्रसादं कुर्वाते स देवौ द्रष्टुमर्हति
tapasā tejasā caiva durnirīkṣau surairapiyasya prasādaṃ kurvāte sa devau draṣṭumarhati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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