महाभारत 12.323.35
अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम्सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते
atha sūryasahasrasya prabhāṃ yugapadutthitāmsahasā dṛṣṭavantaḥ sma punareva bṛhaspate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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