महाभारत 12.323.39
एकस्तु शब्दोऽविरतः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितःजितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन
ekastu śabdo'virataḥ śruto'smābhirudīritaḥjitaṃ te puṇḍarīkākṣa namaste viśvabhāvana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें