महाभारत 12.324.8
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रियःकथं स्विदन्यथा ब्रूयाद्वाक्यमेष महान्वसुः
yajvā dānapatiḥ śreṣṭhaḥ sarvabhūtahitapriyaḥkathaṃ svidanyathā brūyādvākyameṣa mahānvasuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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