महाभारत 12.326.5
नीलवैडूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित्मयूरग्रीववर्णाभो मुक्ताहारनिभः क्वचित्
nīlavaiḍūryasadṛśa indranīlanibhaḥ kvacitmayūragrīvavarṇābho muktāhāranibhaḥ kvacit
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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