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महाभारत 12.330.52
नागृह्णात्पावकः शुभ्रं मखेषु सुहुतं हविःवेदा न प्रतिभान्ति स्म ऋषीणां भावितात्मनाम्
nāgṛhṇātpāvakaḥ śubhraṃ makheṣu suhutaṃ haviḥvedā na pratibhānti sma ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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