महाभारत 12.332.1
नरनारायणावूचतुःधन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यत्ते दृष्टः स्वयं प्रभुःन हि तं दृष्टवान्कश्चित्पद्मयोनिरपि स्वयम्
naranārāyaṇāvūcatuḥdhanyo'syanugṛhīto'si yatte dṛṣṭaḥ svayaṃ prabhuḥna hi taṃ dṛṣṭavānkaścitpadmayonirapi svayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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