महाभारत 12.336.50
नारदेन तु संप्राप्तः सरहस्यः ससंग्रहःएष धर्मो जगन्नाथात्साक्षान्नारायणान्नृप
nāradena tu saṃprāptaḥ sarahasyaḥ sasaṃgrahaḥeṣa dharmo jagannāthātsākṣānnārāyaṇānnṛpa
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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