महाभारत 12.336.55
मनश्च प्रथितं राजन्पञ्चेन्द्रियसमीरणम्एष लोकनिधिर्धीमानेष लोकविसर्गकृत्
manaśca prathitaṃ rājanpañcendriyasamīraṇameṣa lokanidhirdhīmāneṣa lokavisargakṛt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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