महाभारत 12.349.4
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात्पृच्छामि ते द्विजविविक्ते गोमतीतीरे किं वा त्वं पर्युपाससे
ābhimukhyādabhikramya snehātpṛcchāmi te dvijavivikte gomatītīre kiṃ vā tvaṃ paryupāsase
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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