महाभारत 12.46.22
चातुर्वेद्यं चातुर्होत्रं चातुराश्रम्यमेव चचातुर्वर्ण्यस्य धर्मं च पृच्छैनं पृथिवीपते
cāturvedyaṃ cāturhotraṃ cāturāśramyameva cacāturvarṇyasya dharmaṃ ca pṛcchainaṃ pṛthivīpate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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