महाभारत 12.47.67
ते स्तुवन्तश्च विप्राग्र्याः केशवं पुरुषोत्तमम्भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशशंसुः पुनः पुनः
te stuvantaśca viprāgryāḥ keśavaṃ puruṣottamambhīṣmaṃ ca śanakaiḥ sarve praśaśaṃsuḥ punaḥ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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