महाभारत 12.49.49
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपाःपरावसुर्महाराज क्षिप्त्वाह जनसंसदि
viśvāmitrasya pautrastu raibhyaputro mahātapāḥparāvasurmahārāja kṣiptvāha janasaṃsadi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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