महाभारत 12.49.65
रक्षिणश्च समुद्दिश्य प्रायाचत्पृथिवी तदाप्रसाद्य कश्यपं देवी क्षत्रियान्बाहुशालिनः
rakṣiṇaśca samuddiśya prāyācatpṛthivī tadāprasādya kaśyapaṃ devī kṣatriyānbāhuśālinaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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