महाभारत 12.56.6
अत्र वै संप्रमूढे तु धर्मे राजर्षिसेवितेलोकस्य संस्था न भवेत्सर्वं च व्याकुलं भवेत्
atra vai saṃpramūḍhe tu dharme rājarṣisevitelokasya saṃsthā na bhavetsarvaṃ ca vyākulaṃ bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें