महाभारत 12.57.14
त्रय्या संवृतरन्ध्रश्च राजा भवितुमर्हतिवृजिनस्य नरेन्द्राणां नान्यत्संवरणात्परम्
trayyā saṃvṛtarandhraśca rājā bhavitumarhativṛjinasya narendrāṇāṃ nānyatsaṃvaraṇātparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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