महाभारत 12.57.41
राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम्राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम्
rājānaṃ prathamaṃ vindettato bhāryāṃ tato dhanamrājanyasati lokasya kuto bhāryā kuto dhanam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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