महाभारत 12.59.101
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषयस्तस्य मन्त्रतःततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि
mamanthurdakṣiṇaṃ corumṛṣayastasya mantrataḥtato'sya vikṛto jajñe hrasvāṅgaḥ puruṣo bhuvi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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