महाभारत 12.59.9
कथमेको महीं कृत्स्नां वीरशूरार्यसंकुलाम्रक्षत्यपि च लोकोऽस्य प्रसादमभिवाञ्छति
kathameko mahīṃ kṛtsnāṃ vīraśūrāryasaṃkulāmrakṣatyapi ca loko'sya prasādamabhivāñchati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें