महाभारत 12.60.42
ऋग्यजुःसामवित्पूज्यो नित्यं स्याद्देववद्द्विजःअनृग्यजुरसामा तु प्राजापत्य उपद्रवः
ṛgyajuḥsāmavitpūjyo nityaṃ syāddevavaddvijaḥanṛgyajurasāmā tu prājāpatya upadravaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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