महाभारत 12.63.2
सेव्यं तु ब्रह्मषट्कर्म गृहस्थेन मनीषिणाकृतकृत्यस्य चारण्ये वासो विप्रस्य शस्यते
sevyaṃ tu brahmaṣaṭkarma gṛhasthena manīṣiṇākṛtakṛtyasya cāraṇye vāso viprasya śasyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें