महाभारत 12.66.5
अकामद्वेषयुक्तस्य दण्डनीत्या युधिष्ठिरसमेक्षिणश्च भूतेषु भैक्षाश्रमपदं भवेत्
akāmadveṣayuktasya daṇḍanītyā yudhiṣṭhirasamekṣiṇaśca bhūteṣu bhaikṣāśramapadaṃ bhavet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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