महाभारत 12.73.7
ततः पृथिव्या गोप्तारं क्षत्रियं दण्डधारिणम्द्वितीयं वर्णमकरोत्प्रजानामनुगुप्तये
tataḥ pṛthivyā goptāraṃ kṣatriyaṃ daṇḍadhāriṇamdvitīyaṃ varṇamakarotprajānāmanuguptaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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