महाभारत 12.83.41गहनं भवतो राज्यमन्धकारतमोवृतम्नेह विश्वसितुं शक्यं भवतापि कुतो मयाgahanaṃ bhavato rājyamandhakāratamovṛtamneha viśvasituṃ śakyaṃ bhavatāpi kuto mayāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें