महाभारत 12.83.56
ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति न ते वत्स्यन्ति मे गृहेभवतैव हि तज्ज्ञेयं यदिदानीमनन्तरम्
ye tvāṃ brāhmaṇa necchanti na te vatsyanti me gṛhebhavataiva hi tajjñeyaṃ yadidānīmanantaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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