महाभारत 12.83.66
एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय यशस्विनेमुनिः कालकवृक्षीय ईजे क्रतुभिरुत्तमैः
ekacchatrāṃ mahīṃ kṛtvā kausalyāya yaśasvinemuniḥ kālakavṛkṣīya īje kratubhiruttamaiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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