महाभारत 12.90.7
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं लोकानामिह जीवनम्ऊर्ध्वं चैव त्रयी विद्या सा भूतान्भावयत्युत
kṛṣigorakṣyavāṇijyaṃ lokānāmiha jīvanamūrdhvaṃ caiva trayī vidyā sā bhūtānbhāvayatyuta
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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