महाभारत 12.95.3
यस्य स्फीतो जनपदः संपन्नः प्रियराजकःसंतुष्टपुष्टसचिवो दृढमूलः स पार्थिवः
yasya sphīto janapadaḥ saṃpannaḥ priyarājakaḥsaṃtuṣṭapuṣṭasacivo dṛḍhamūlaḥ sa pārthivaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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