महाभारत 12.95.4
यस्य योधाः सुसंतुष्टाः सान्त्विताः सूपधास्थिताःअल्पेनापि स दण्डेन महीं जयति भूमिपः
yasya yodhāḥ susaṃtuṣṭāḥ sāntvitāḥ sūpadhāsthitāḥalpenāpi sa daṇḍena mahīṃ jayati bhūmipaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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