महाभारत 12.97.5
नार्वाक्संवत्सरात्कन्या स्प्रष्टव्या विक्रमाहृताएवमेव धनं सर्वं यच्चान्यत्सहसाहृतम्
nārvāksaṃvatsarātkanyā spraṣṭavyā vikramāhṛtāevameva dhanaṃ sarvaṃ yaccānyatsahasāhṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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