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महाभारत 13.10.55
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनिं प्राप्स्यसे द्विजगृह्यतां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम
itastvamadhamāmanyāṃ mā yoniṃ prāpsyase dvijagṛhyatāṃ draviṇaṃ vipra pūtātmā bhava sattama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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