महाभारत 13.100.8
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वापयोमूलफलैर्वापि पितॄणां प्रीतिमाहरन्
kuryādaharahaḥ śrāddhamannādyenodakena vāpayomūlaphalairvāpi pitṝṇāṃ prītimāharan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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