महाभारत 13.101.50दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभःदीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमाली विराजतेdīpahartā bhavedandhastamogatirasuprabhaḥdīpapradaḥ svargaloke dīpamālī virājateइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें