महाभारत 13.105.50
न द्वेष्यो न प्रियः कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथान जरामरणे वापि न पुण्यं न च पातकम्
na dveṣyo na priyaḥ kaścinna bandhurna ripustathāna jarāmaraṇe vāpi na puṇyaṃ na ca pātakam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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