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महाभारत 13.107.24
प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद्वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत्
prāṅmukho nityamaśnīyādvāgyato'nnamakutsayanpraskandayecca manasā bhuktvā cāgnimupaspṛśet
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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