महाभारत 13.107.45
ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद्ध्यानेनावेक्षितेन चतस्मादेतत्त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डितः
brāhmaṇastu kulaṃ hanyāddhyānenāvekṣitena catasmādetattrayaṃ yatnādupaseveta paṇḍitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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