महाभारत 13.112.55
भर्तृपिण्डमुपाश्नन्यो राजद्विष्टानि सेवतेसोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानरः
bhartṛpiṇḍamupāśnanyo rājadviṣṭāni sevateso'pi mohasamāpanno mṛto jāyati vānaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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