महाभारत 13.116.55
आकाशान्मेदिनीं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिःएतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम्
ākāśānmedinīṃ prāptastataḥ sa pṛthivīpatiḥetadeva punaścoktvā viveśa dharaṇītalam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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