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महाभारत 13.117.32
सर्वमांसानि यो राजन्यावज्जीवं न भक्षयेत्स्वर्गे स विपुलं स्थानं प्राप्नुयान्नात्र संशयः
sarvamāṃsāni yo rājanyāvajjīvaṃ na bhakṣayetsvarge sa vipulaṃ sthānaṃ prāpnuyānnātra saṃśayaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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