महाभारत 13.118.7
ब्रह्मभूतश्चरन्विप्रः कृष्णद्वैपायनः पुराददर्श कीटं धावन्तं शीघ्रं शकटवर्त्मनि
brahmabhūtaścaranvipraḥ kṛṣṇadvaipāyanaḥ purādadarśa kīṭaṃ dhāvantaṃ śīghraṃ śakaṭavartmani
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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