महाभारत 13.12.7
एकाश्वेन च राजर्षिर्भ्रान्त इन्द्रेण मोहितःन दिशोऽविन्दत नृपः क्षुत्पिपासार्दितस्तदा
ekāśvena ca rājarṣirbhrānta indreṇa mohitaḥna diśo'vindata nṛpaḥ kṣutpipāsārditastadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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