महाभारत 13.123.5
तपसा महदाप्नोति विद्यया चेति नः श्रुतम्तपसैव चापनुदेद्यच्चान्यदपि दुष्कृतम्
tapasā mahadāpnoti vidyayā ceti naḥ śrutamtapasaiva cāpanudedyaccānyadapi duṣkṛtam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें