महाभारत 13.125.7
रक्षस्तु वाचा संपूज्य प्रश्नं पप्रच्छ तं द्विजम्मोक्ष्यसे ब्रूहि मे प्रश्नं केनास्मि हरिणः कृशः
rakṣastu vācā saṃpūjya praśnaṃ papraccha taṃ dvijammokṣyase brūhi me praśnaṃ kenāsmi hariṇaḥ kṛśaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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