महाभारत 13.133.27
मार्गार्हाय ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चयन्अतिथिप्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजकः
mārgārhāya dadanmārgaṃ guruṃ guruvadarcayanatithipragraharatastathābhyāgatapūjakaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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