महाभारत 13.14.21
समुद्रा दक्षिणा स्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहाःदेवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च
samudrā dakṣiṇā stobhā ṛkṣāṇi pitaro grahāḥdevapatnyo devakanyā devamātara eva ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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