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महाभारत 13.14.38
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यैः; संप्रक्षालैर्यतिभिर्ध्याननित्यैःधूमाशनैरूष्मपैः क्षीरपैश्च; विभूषितं ब्राह्मणेन्द्रैः समन्तात्
vāyvāhārairambupairjapyanityaiḥ; saṃprakṣālairyatibhirdhyānanityaiḥdhūmāśanairūṣmapaiḥ kṣīrapaiśca; vibhūṣitaṃ brāhmaṇendraiḥ samantāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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