महाभारत 13.14.63
तांश्चापि दैवतश्रेष्ठः प्राह प्रीतो जगत्पतिःसुपर्णं सोमहर्तारं तपसोत्पादयिष्यथ
tāṃścāpi daivataśreṣṭhaḥ prāha prīto jagatpatiḥsuparṇaṃ somahartāraṃ tapasotpādayiṣyatha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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