महाभारत 13.148.14
सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं देवनिर्मितम्नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासविधिर्हि सः
sāyaṃ prātarmanuṣyāṇāmaśanaṃ devanirmitamnāntarā bhojanaṃ dṛṣṭamupavāsavidhirhi saḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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