महाभारत 13.151.5
उमापतिर्विरूपाक्षः स्कन्दः सेनापतिस्तथाविशाखो हुतभुग्वायुश्चन्द्रादित्यौ प्रभाकरौ
umāpatirvirūpākṣaḥ skandaḥ senāpatistathāviśākho hutabhugvāyuścandrādityau prabhākarau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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