महाभारत 13.153.5
उषित्वा शर्वरीः श्रीमान्पञ्चाशन्नगरोत्तमेसमयं कौरवाग्र्यस्य सस्मार पुरुषर्षभः
uṣitvā śarvarīḥ śrīmānpañcāśannagarottamesamayaṃ kauravāgryasya sasmāra puruṣarṣabhaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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